समाज..

क्युं हैं रे समाज , क्युं है ये तेरी नीतियाँ ..
सिर्फ तेरे कारन ना जाने खो गयी कितानी हसींकी ठहाकियाँ..

धरम – जात पे ही सिर्फ तू सबको तोलता रेहता हैं..
ना जाने क्यूं तु जिंदगी दुसरो की यूँ पिरोता रेहता हैं..

अरे , तेरे इन लीला से भगवान भी ना बच पाये..
राधेश्याम बस नाम के ही रेह गये, कभी एक जान ना हो पाये..

रंग – रूप , शौरत के ढाचे तो पेहलेसेही हैं बनाये..
जो ना बैठे उनमे उनका जीना भी तू दश्वार कराये..

कैसा जाल बनाया हैं रे समाज तूने की निकाल ना पाये
आम इंसान इससे बाहर..
सब जानते हुये भी क्युँ करना पडता हैं आचरण तेरे
नियमों का , चाहे कितने भी लगे ठोकर..

-String_of_Thoughts
-Harshada Raut